बुधवार, 29 मार्च 2017

कल्पना

ये वक़्त है बिखरा हुआ,
दूरियाँ शमशीर सी,
खूबसूरत है नजारे,
और तेरी याद है;


चाँदनी से नहाकर,
लेकर तेरी तस्वीर दिल में,
रात भर तकता हूँ मैं,
इस इश्क़-ए-कुदरत चाँद को,
और खुद से बोलता हूँ,
तू भी यही तकती होगी,
और तेरी जुल्फ अब,
चेहरे से होगी खेलती,
तूने उसे रीझ कर,
हाथों से पीछे झटका होगा;
                                                                         
जब कभी मैं देखता हूँ,                         
समंदर का गाढ़ा नीला रंग,                   
एक टक बस देखता हूँ,                        
तेरी आँखों को लेकर जहन में,              
जैसे छुपा लेता है समंदर,                     
अपने अंतर में संसार की,                     
ऐसे छुपा लेती थी तू भी,                       
अपने नैनों में,                                       
 मेरे प्यार को;                                     
                                                                              
अक्सर उठकर सुबह बिस्तर से,                             
मैं दौड़ता हूँ, खिड़की की ओर,                
और देखता हूँ, सूरज का वो,                   
तेरे होठों सा लहू-लाल रंग,                      
वो क्षितिज की लालिमा,                                                     
वो गाल हैं जैसे तेरे,                                
और सुऱख लाल सूरज,                          
जैसे तेरा होंठ है;                                    
                                                             
सुबह-सुबह  तैयार होकर,
आईने के सामने,
अपने कॉलर को संभालकर ,
बालों में कंघी डालकर,
अक्सर ख़ुद से बोलता हूँ,
"अच्छे लगते हो ज़नाब",
और हस देता हूँ खुदपर,
की तू होती तो यही कहती;

यदि ये है मेरी कल्पना,   
ये चाँद है चेहरा तेरा,ये समंदर तेरी आँखे है,
ये सूरज तेरे लाल होंठ,
ये सच है,तो अच्छा है,ये झूठ है,तो रहने दो,
मेरी हर सांस में, हर धड़कन में,
मेरी उठती गिरती पलकों में,
मेरी जहन में, मेरी बात में,
मेरे दिल में, मेरी याद में,    
तू मेरे साथ है,तू मेरे साथ है;   

तू मुझसे दूर कहाँ,       
इस चाँद का दीदार कर,  
मैं बस तेरा हूँ,
इस एहसास का एहसास कर,
अपने दिल पर हाथ रख, 
और मुझसे बात कर,   
मैं लौट आऊंगा, बस मेरा इंतजार कर,
प्यार कर मेरी जान, मुझे प्यार कर;
प्यार कर मेरी जान, मुझे प्यार कर॥ 

गुरुवार, 23 मार्च 2017

अश्रुमगन

भी मिलना, तुम्हे हम सैलाब दिखाएगें
अपने टूटे हुए अश्रुमगन ख्वाब दिखाएगें;

जो जो तुमने कहा था, 
मैं अल्फाज नहीं भूलता,
मैं रो लेता हूँ कभी कभी, 
पर किसी से नहीं बोलता;

हर बार कलम को नकार देता हूँ,
जो तेरी याद में लिखी थी, 
पर वो डायरी नहीं खोलता;

यही मौसम है, 
जब अलग हुए थे हम दोनों,
यही मौसम था , 
जब साथ रहने का वादा किया था;

तेरे चहरे पर आज वो मुस्कराहट नहीं है,
हाँ, मेरे मिलने का वो लहज़ा भी अब नहीं है;

शनिवार, 18 मार्च 2017

मुझे आदत है

मुझे आदत है तेरे ख्वाबों की,
अकेले चाँद की,तन्हा रातो की,
अकेले बोलकर फिर,
सुन लेने वाली बातो की,
अकेले सावन की, 
अकेली बरसातों की;

तू कहीं दूर खुश है,
सपनों की लहरों में,
मैं साहिल हूँ,मुझे आदत है,
लहरो के लातों की;

तू भी कभी एक जख्म देने को ही आ,
मुझे आदत है, सहने की,
चोट आते जातो की,
मुझे आदत है,तेरे ख्वाबों की,
मुझे आदत है,तेरी यादों की;

मैं पत्थर था कभी,
अब टूट कर बिखरना चाहता हूँ,
तू मूरत थी प्यार की,
मैं भी संवारना चाहता हूँ; 

किसी बहाने से मुझे
संवारने के लिए आ,
मेरी जिन्दगी, मेरे साथ,
एक पल गुजारने के लिए आ,
मैं जीना चाहता हूँ,
मेरी जिन्दगी की डोर,
संभालने के लिए आ;

तुझे कसम है मेरे प्यार की,
मेरे अनकहे रिश्ते नातों की,
मेरे साथ गुजारे पलों की,
मेरे याद में गुजरी रातों की,
मेरे हर बात की,मेरे साथ की बरसातों की;

मुझे आदत है, तेरी यादों की। 

रविवार, 12 मार्च 2017

सवाल

क सवाल है कमाल ही,
मिलता नहीं जवाब भी;

हम थे कभी अपने, 
तो अब इतने फासले क्यूँ है,
गर हम अज़नबी थे, 
तो फिर ये यादें क्यूँ है;

अगर हम दोस्त थे, 
तो हमारा हक़ कहाँ है अब,
गर हम दुश्मन थे, 
तो फिर हमें मिटाया क्यूँ नहीं;

अगर इश्क़ था मुझसे, 
तो जताना चाहिए था;
गर नफरत थी,
तो बताना चाहिए था। 

गुरुवार, 9 मार्च 2017

घर

र से दूर हूँ तो,
एक मसला याद आता है,
जिस मंजिल की तम्मना थी,
वो रास्ता तो घर तक जाता है;

जब कुछ पाने की ख्वाइश में,
मैं घर से निकलता था,
कुछ बेड़ियाँ थी उस घर मे,
जो मुझे बाध लेती थी;

क्यूँ टूट के भी हस्ती थी बेड़ी,
क्यों फूट के रोता था कमरा,
और देखकर गठरी,
क्यूँ बुजुर्ग मुस्कराते थे ?

आज घर से जो निकला हूँ,
तो सब समझ आता है,
आज फिर से वही घर,
याद आता है;

बिस्तर जोर से हस्ता है,
तकिया लगती है मुस्कराने,
जब आराम छोड़कर उठता हूँ,
मैं आराम कमाने;

बचपन में एक तोता पाला था,
आज वो तोता याद आता है,
जब मुझे देखता तो,
खरी-खोटी सुनाता था;
कहता, जब में जंगल में था,
परिंदों का राजा था,
जो आज मुझे इतना सा खाने को देते हो,
इससे ज्यादा मैं पेड़ो पर खा जाता था;

कुछ महीने बाद पिजरा तोड़ दिया हमने,
जा उड़ जा तोते तुझे छोड़ दिया हमने,
वो टूटे भाग तक जाता,
फिर लौट आता था,
वो आज़ाद था लेकिन कही नहीं जाता था,
अपने चोंच से उठाकर, तारो को लगाता था,
जब मैं देखू ,तो गुस्सा कर बैठ जाता था;

फिर एक दिन यूँही जब,
देखना छोड़ दिया हमने,
उसने गुस्से में कहा मुझसे,
क्यूँ घर मेरा तोड़ दिया तुमने,

तब हँसा था मैं,
कुछ समझ नहीं पाया था,
आज आँखे भारी होती है,
जब वो पिजरा याद आता है;

नोटों से भरा थैला लेकर,
जब अपने दरवाजे पर पंहुचा मैं,
मेरे बूढ़े घर ने कुछ कहा की रो पड़ा मैं;

जिसे मिट्टी का खंडर कह कर,
छोड़ आया था,
कुछ बाकी नहीं रहा इसमें,
चिल्लाकर बोल आया था;

जब लौटा वहाँ तो,
उसने बाहें खोल दी,
जो कैद थी उसमे याँदे,
मेरे पुरखों की बोल दी,

सुख की ख्वाइश में,
मैं सुकून छोड़ आया था,
मै चाँदी कमाने निकला था,
हीरा  छोड़ आया था। 

सोमवार, 6 मार्च 2017

राधा कहे किसे

आप सब यह बात जानते है, की कृष्ण राधा से बहुत प्रेम करते थे लेकिन कंस को मारने के लिए और अपने माता पिता को उसकी कैद से छुड़ाने के लिए उन्हें वृन्दावन से मथुरा जाना पड़ा। कंस को मारने के बाद वो वहाँ के राजा बने। फिर कुछ समय बाद वो द्वारिका चले गए ।वहाँ जाकर उन्होंने रुखमणी से विवाह कर लिया। 
यह कविता कृष्ण और राधा के वियोग की कविता है। 

क साख पर बैठा,
सोचता बस यही,
कोई दिखाई नहीं देता,
की अपना कहे जिसे,
बहुत सुन्दर है मथुरा,
बहुत चाहने वाले लोग,
पर कृष्णा यही सोचे,
की राधा कहे किसे;

कभी कलम उठाये,
तो शब्द भूल जाये,
बाँसुरी उठाये कभी,
तो राग भूल जाये,
होंठ कहे राधा,
और नींद टूट जाये,
लहू आसार बहे आँसू,
और सांस छूट जाये;

तकिये को लगा के सीने से,
चक्रधारी रोयें,
बहुत दर्द है राधा,
तुमसे मिले कैसे,
कितना भारी है मुकुट,
कितना भारी है सुदर्शन,
मैं धीश यहाँ का,
इनसे कहू कैसे;

कितना प्यारा था मोहन,
कितना गैर है राजा,
कहाँ छोटा सा वृन्दावन,
कंहाँ मेरी पहुँच से ज्यादा,
जब मेरी मिट्टी के घर पर भी,
तेरा हक़ था आधा,
तो क्या अब गैर है गिरधारी,
की तुमपर हक़ नही राधा;

तुमसे मिले कैसे,तुमसे कहे कैसे,
दूर तक कोई दिखायी नहीं देता,
की अपना कहे जिसे, की राधा कहे जिसे॥ 

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

नकाब

र गम को अमानत समझ कर समेट रखा है,
इस चेहरे पर ख़ुशियों का नकाब लपेट रखा है,


मत देख मेरी आँखों में यूँ, 

ये छलक जाएंगी,

अश्को का इन्होंने,

एक समंदर सोख रखा है,

मेरे जनाज़े पर मत रोना,

मैं ना रहू तो क्या,

तेरी खुशियों की खातिर मैंने,

खुद को ही बेच रखा है;